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विश्व बैंक के बाद, एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक ने अपना निवेश अमरावती कैपिटल सिटी परियोजना से वापस लिया

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प्रेस रिलीज | २३ जुलाई २०१९

विश्व बैंक के बाद, एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक ने अपना निवेश अमरावती कैपिटल सिटी परियोजना से वापस लिया 

चीन के नेतृत्व वाले एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) ने आंध्र प्रदेश के अमरावती कैपिटल सिटी परियोजना से हाथ खींच लिए है। विश्व बैंक द्वारा पिछले सप्ताह अमरावती परियोजना से अपना निवेश वापस लेने के बाद इसके प्रवक्ता लॉरेल ओस्टफील्ड द्वारा यह निर्णय एक समाचार एजेंसी को संप्रेषित किया गया।

एआईआईबी कुल $715 मिलियन की परियोजना में से $200 मिलियन के वित्तपोषण पर विचार कर रहा था, जबकि विश्व बैंक $ 300 मिलियन पर विचार कर रहा था।

चार साल पुराने एआईआईबी ने इससे पहले कभी भी किसी परियोजना से अपना निवेश वापस नहीं लिया है।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने लॉरेल ओस्टफील्ड के द्वारा कहा, “एआईआईबी अब फंडिंग के लिए अमरावती सस्टेनेबल इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड इंस्टीट्यूशनल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर विचार नहीं कर रहा है।” एआईआईबी इस परियोजना को केवल एक सह-वित्तदाता के रूप में देख रहा था और इसमें विश्व बैंक की सुरक्षा नीतियों का पालन करना था। विश्वबैंक केपरियोजना से बाहर निकलने के फैसले के बाद, एआईआईबी के इस फैसले पर गहरी निगाह रखी जा रही थी।

इस परियोजना के कारण हुए भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के गंभीर दबाव और भय के कारण हुए सामाजिक-आर्थिक नुकसान से हज़ारोंमजदूरों, किरायेदारों, भूमिहीन परिवारों, एवं दलितों समुदाय के लोगों को नुक़सान पहुँचा है। इन मुद्दों के साथ ही परियोजना की वित्तीय गैर-व्यवहार्यता और स्वैच्छिक भूमि-पूलिंग के नाम पर उपजाऊ भूमि के बड़े पैमाने पर हुए कब्जे को जनांदलोंऔर नागरिक समाज संगठनों ने सरकार, एआईआईबी व विश्व बैंक के समक्ष कई बार  उठाया गया।

वर्किंग ग्रुप ऑन इंटरनेशनल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस (WGonIFI) और अमरावती कैपिटल सिटी प्रोजेक्ट के प्रभावित समुदाय एआईआईबी केइस फैसले का स्वागत करते हैं और इसे उन लोगों की जीत के रूप में मानते हैंजो प्रशासन के भय और दबाव एवं वित्तीय संस्थानों की उपेक्षा के बावजूद अपने हक के लिए खड़े रहे।

“जैसा कि हमने नर्मदा बांध परियोजना के मामले में देखा है, किसी भी परियोजना मे विश्व बैंक का वित्तपोषण अन्य द्विपक्षीय और बहुपक्षिय एजेंसियों को भी साथ ले आता है जिनमे से प्रत्येक स्वतंत्र रूप से बिना उचित वैधानिक प्रक्रिया के काम करते है। वित्तीय संस्थानों और तंत्रों के बीच यह गठजोड़ मजबूत हो रहा है और जैसा कि हमने अमरावती परियोजना के मामले में देखा है, लोगो की एकजुटता एवं वैज्ञानिक तथ्य ही उन्हें झुका सकते हैं,” नर्मदा बचाओ आंदोलन एवं नेशनल एलियान्स आफ पीपलस मूवमेंट की वरिष्ठ कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा।

विश्व बैंक ने दूसरे दिन एक बयान जारी कर कहा था कि यह भारत सरकार ही थी जिसने उधार देने के अनुरोध को वापस ले लिया, जो की याद दिलाता है कि 1992 में सरदार सरोवर (नर्मदा) बांध के मामले में भी सरकार ने 27 साल पहले यही किया था। मोर्स कमेटी द्वारा सरदार सरोवर परियोजना पर एक गंभीर रिपोर्ट के बाद विश्व बैंक ने जोर देकर कहा था कि भारत सरकार को पुनर्वास एवं और पर्यावरण सुरक्षा उपायों की सख्त शर्तों को पूरा करना होगा। बैंक ने यह जांचने के लिए एक टीम को भारत भेजा ताकि शेष $170 मिलियन ऋण का भुगतान करने से पहले यह देख सके कि इन शर्तों को पूरा किया गया है या नहीं। समय सीमा से ठीक एक दिन पहले – 31 मार्च, 1992 – को बैंक ने घोषणा की कि भारत ने अपने दम सरदार सरोवर परियोजना का निर्माण कार्य पूरा करने का फैसला किया है।

अमरावती के मामले में, विश्व बैंक की स्वतंत्र जवाबदेही तंत्र के निरीक्षण पैनल को अमरावती परियोजना की जांच पर अपना निर्णय देने के एक हफ़्ते पहले भारत सरकार ने अपना अनुरोध वापस ले लिया था।

“विश्व बैंक के बाद अब एआईआईबी ने इस परियोजना से हाथ खींच लिया,यह लोगो की एक बड़ी कामयाबी है। भारत सरकार द्वारा बैंक से अनुरोध वापस लेने की तकनीकी केवल एक झांसा है। चंद्रबाबू नायडू की सरकार मे विश्व बैंकके निरीक्षण पैनल द्वारा एक संभावित जांच से कई उल्लंघन एवं किसानों पर हुए ज़ुल्म और अन्याय का खुलासा हुआ होगा,”आर्थिक और सामाजिक अध्ययन केंद्र, हैदराबाद के प्रोफेसर रामचंद्रैयाने कहा।

बड़ी संख्या में लोगों के आंदोलनों, विशेषज्ञों और नागरिक समाज संगठनों की एकजुटता और समर्थन के बिना यह जीत संभव नहीं थी। “दो बड़े वित्तीय दिग्गजों का इस पर्यावरण और सामाजिक रूप से विनाशकारी परियोजना से बाहर निकलना – लोगों, नागरिक, समाज, संगठनों एवं  कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी जीत है जो पिछले चार वर्षों से विभिन्न मंचों पर इस परियोजना को लगातार चुनौती दे रहे हैं। इन वित्तीय संस्थानों को यह महसूस करने का समय आ गया है कि अगर ये संस्थान विनाशकारी परियोजनाओं को अलोकतांत्रिक और अन्यायपूर्ण तरीके से वित्त देने के पालन जारी रखेंगे तो लोग उनके खिलाफ सामूहिक आवाज उठाएंगे, और जीतेंगे,” अनुराधा मुंशी, सेंटर फॉर फाइनेंसियल अकाउंटेबिलिटी।

WGonIFIs राज्य सरकार से मांग करता है कि,

  1. केंद्रीय भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास कानून, 2013के विसंगत CRDA भूमि अधिग्रहण अधिनियम, CRDA प्राधिकरण और संबंधित अधिसूचना को खारिज किया जाए और अमरावती राजधानी क्षेत्रके सभी प्रभावितों के मामले में केंद्रीय कानून को पूर्ण रूप से लागू किया जाए। इसके साथ सरकार द्वारा बिना सहमति ली गई सभी जमीन को वापस लोगों को दिया जाए।
  2. किसानों, तटीय समुदायों, खेतिहर मजदूरों, बटायेदारों, भूमिहीन परिवारों, जिनको जमीन अधिग्रहण और विस्थापन के दौरान अत्यंत पीड़ा और भय-व्याप्त समय से गुजरना पड़ा, उनको हुए सामाजिक-आर्थिक नुकसान, जमीन के मामले और मानसिक प्रताड़ना की न्यायिक जांच की जाए।
  3. पिछले पांच वर्षों में सामाजिक जीवन को पहुंचे नुकसान को देखते हुए दलित और दूसरे निर्दिष्ट भू-मालिकों के लिए विशेष मुआवजे की घोषणा की जाए।
  4. राजधानी क्षेत्र की घोषणा के बाद सक्रिय हुए दलालों, जो दलितों और निर्दिष्ट भू-मालिकों की जमीन खरीदने की प्रक्रिया में शामिल थे, के ऊपर सख्त कार्यवाही की जाए।
  5. दलित किसानों को दस्तावेजों में धांधली कर उन्हें बेदखल करने की कोशिशों को रोका जाए और सभी दलित किसानों को, जिनका जमीन पर वास्तविक कब्ज़ा है, उन्हें 2013 के कानून अनुसार मुआवजा, पुनर्स्थापन और पुनर्वास के लिए वास्तविक भू-मालिक माना जाए।

परियोजना के बारे में:
जून, 2014 में पूर्व के आंध्र प्रदेश राज्य के बँटवारे के बाद, दोनों राज्य, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ने हैदराबाद को राजधानी के रूप में अगले 10 वर्षों तक रखने का फैसला किया। उसी वर्ष सितम्बर में चंद्रबाबू नायडू, आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, ने अमरावती को नए राजधानी शहर के रूप में बनाने की घोषणा की। विश्व बैंक और AIIB, इस परियोजना के लिए $715 मिलियन वित्त प्रदान करने पर विचार कर रही थी।

इसके प्रभाव आंकलन में भी इसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को देखते हुए विश्व बैंक ने इस परियोजना को A केटेगरी प्रदान की थी । कृष्णा नदी घाटी के ऊपर बनाए जाने के लिए, उपजाऊ खेती की भूमि और जंगलों के विनाश, 20000 से अधिक परिवारों को विस्थापित करने, जबरन भूमि अधिग्रहण, और शहर निर्माण में मनचाहे ठेकेदारों को ठेका देने के कारण यह परियोजना बेहद विवादित रही है। 2017 में विश्व बैंक के जवाबदेही तंत्र के ‘इंस्पेक्शन पैनल’ में प्रभावितों ने शिकायत की और विश्व बैंक के नियमों के उल्लंघनों की जांच के लिए कहा। यह शिकायत अभी प्रक्रिया में थी और बैंक की बोर्ड, इंस्पेक्शन पैनल द्वारा इसकी जांच करने के लिए प्रस्ताव का इंतज़ार कर रही थी।

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जायें: Encroachment of Nature, People and Livelihoods: A Case of the Abusive, Greedy and Failing Amaravati Capital City (2014-2019)

परियोजना के बारे में जानकारी यहाँ भी उपलब्ध है। 

संपर्क विवरण:

  1. जी रोहित
    मानवाधिकार मंच, आंध्र प्रदेश
    gutta.rohithbunny@gmail.com
    +91 99852 50777
  2. मीरा संघमित्रा
    नेशनल एलाएंसे ऑफ पीपलस मूवमेंट
    +91 73374 78993
    reachmeeranow@gmail.com
  3. टैनी एलेक्स
    शोधकर्ता, सेंटर फॉर फाइनेंसियल अकाउंटेबिलिटी
    +91 96500 15701
    tani@cenfa.org

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