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May 1 2017 (Hindi)

1 मई 2017

एडीबी स्थापना के 50 वर्ष पर, भारत भर में 100 से अधिक स्थानों में विरोध प्रदर्शन इस सप्ताह

नई दिल्ली: 1 मई से 7 मई 2017 के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में जनांदोलन और अन्य नागरिक समाज संगठन एशियाई विकास बैंक (एडीबी) की स्थापना की 50वीं वर्षगांठ पर 100 से अधिक जगहों पर विरोध प्रदर्शन करेंगे।

ये संगठन एडीबी और अन्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (आईएफआई) द्वारा सार्वजनिक धन का उपयोग हेतु प्रोत्साहित किये जा रहे ‘विकास मॉडल’ के कारण मानव अधिकारों के उल्लंघन, आजीविका के नुकसान और पर्यावरण के विनाश को उजागर करेंगे।

मई के पहले हफ्ते के दौरान, ये संगठन कई कार्यक्रमों का आयोजन करेंगे। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य एडीबी और अन्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के असफल नव-उदारवाद पूंजीवादी मॉडल जिसमे निजी कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किया जाता है जिसमे जवाबदेही और पारदर्शिता के मुद्दों को उठाकर सभी आईएफआई की जवाबदेही तय करना है।

कई राज्यों में कार्यक्रम आयोजित करने वाले ट्रेड यूनियन नेशनल हाकर्स फेडरेशन के महासचिव शक्तिमान घोष बताते हैं की “एडीबी द्वारा बढ़ावा दिए जा रहे विकास के मॉडल ने आजीविका के नुकसान के साथ-साथ लोगों को उनकी जगह से बेदखल कर उन्हें गरीबी की ओर धकेला है जो की गरीबी से लड़ाई के आदर्श वाक्य के उलट है।” वो आगे बताते हैं कि “शहरी इलाकों में, रेड़ीपटरी विक्रेता बुरी तरह प्रभावित हैं और सेवाओं के निजीकरण में वृद्धि के कारण मध्यवर्ग को भी बख्शा नहीं जाएगा।” (विडीयो संदेश: https://youtu.be/LguAaY4Lwvo)

एडीबी की स्थापना के 50वें वर्ष पर देशभर में आयोजित कार्यक्रमों में विभिन्न संगठन विरोध प्रदर्शन, सार्वजनिक वार्ता, व्याख्यान श्रृंखला इत्यादि का आयोजन करेंगे जिनका उद्देश्य एडीबी के निवेश के गंभीर प्रभावों को उजागर करना है । यह इसीलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि एडीबी अपने ऋण पोर्टफोलियो का विस्तार कर रहा है । इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की अपनी स्थापना के पहले दशक में उसने केवल 3 अरब डॉलर का ऋण दिया था और पिछले दशक मे बढकर 123 अरब डॉलर हो गया है।

इस सप्ताह आयोजित होने वाले 100 से अधिक कार्यक्रम भौगोलिक रूप से हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर से केरल के तिरुवनंतपुरम तक और गुजरात के मुंद्रा से असम के डिब्रूगढ़ तक फैले हुए हैं। यद्यपि इन कार्यकर्मों का समन्वय एडीबी के खिलाफ जनमंच कर रहा है जो की अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के खराब प्रभावों पर काम कर रहे लोगों, आंदोलनों और नागरिक समाज संगठनों का एक मंच है । स्थानीय संगठन अपने स्थान पर प्रासंगिक मुद्दों को उठाते हुए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को दूरगामी प्रभावों से जोड़ रहे हैं।

“एडीबी को भारत में विशेषकर हिमालय में स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रम के नाम पर अपनी परियोजनाओं के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव और सामाजिक स्तर में गिरावट, और अपनी नीतियों की भारत में विफलता को गंभीरता से लेते हुए अपनी जल-परियोजनाओं की समीक्षा करने की आवश्यकता है,” मानशी आशर, हिमधरा से जुडी हुए पर्यावरण अनुसंधानकर्ता कहती हैं। “इसके अलावा, इन परियोजनाओं में लागतों में लगातार वृद्धि ने जल विद्युत परियोजनाओं की वित्तीय व्यवहारिकता पर भी एक प्रश्न चिह्न लगाया है,” वो आगे जोड़ते हुए कहती हैं। (विडीयो संदेश: https://youtu.be/iYkVNQFrDgI)

एडीबी एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के निवेश के परिणामस्वरूप स्थानीय प्रशासन निकाय और अन्य पारंपरिक संस्थान कमजोर हुए है। मणिपुर के इंडिजेनस पर्सपेक्टिव्स से जुडी रतिका यममैन कहती हैं “एडीबी जैसे संस्थानों के निवेश के चलते हमारी संस्कृति और समुदायों का विनाश हो रहा है। एडीबी और अन्य अर्तराष्टीय वित्तीस संस्थानों के लिये उत्तर पूर्व के लोगो के जीवन के अधिकार और उनके जीवन जीने के तरीके बिकाउ नही है। ऐसे संस्थानों को आपने निवेश करने से पहले पूर्नविचार करना चाहिये।” वो आगे कहती हैं की हम आपने देश और संस्कृति की सुरक्षा करना एडीबी से बेहतर जानते है।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों द्धारा जनहीत की नितियो में अनुपातहीन प्रभाव को उजागर करते हुए, बंगलौर स्थित पर्यावरण सहायता समूह के लियो सलधाणा कहते हैं की, “एडीबी ने हमेशा विकास के एक ऐसे तरीके को बढ़ावा दिया है जिससे यह सुनिश्चित होता है कि ऋण प्राप्तकर्ता देशों से राजस्व सुनिश्चित कर उन देशों की ओर प्रवाह करता है जो बैंक के शेयरों को नियंत्रित करते है। वो उदाहरण देते हैं की एडीबी ने भारत में अत्यधिक महंगी मेट्रो परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जो की लोगों की सार्वजनिक परिवहन की वास्तविक जरुरत को पूरा नहीं करते थे. फिर इन परियोजनाओं के मंजूर होने पर ऋण को रद्द कर दिया।

एडीबी के इस कदम से जापान बैंक और जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जेआईसीए) ने मेट्रो परियोजनाओं के लिये वित्तपोषण के रास्ते खोल दिये। “बैंगलोर मेट्रो के मामले में दिलचस्प बात यह है कि इस परियोजना में 300% अधिक व्यय करने के बावजूद अभी तक वो चालु नहीं हुआ है। इस सब के कारण, बैंगलोर, जो की भारत की ‘गार्डन सिटी’ के नाम से मशहूर था, बर्बाद कर दिया!,” सलधाणा दुःख व्यक्त करते हुए कहते हैं।

इसी तरह एडीबी ने भारत भर में विभिन्न परियोजनाओं में ऋण दिया है। गुजरात के कच्छ मे कोस्टल गुजरात पावर लिमीटेड (टाटा मुंद्रा)ने 4000 मेगावाट का कोयला आधारित एक थर्मल पावर प्रोजेक्ट 4 बिलीयन डालर की लागत से बनाया जिसमे एडीबी सह वित्तीय पोषण किया है। जिससे लोगों के जीवन और पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा है। येही नहीं उनके खुद के अनुपालन समीक्षा पैनल ने पाया है की इस परियोजना में निवेश करने से पहले एडीबी ने समुदायों के साथ परामर्श करने की खुद की नीतियों का उल्लंघन किया है और परियोजना की मंजूरी गलत सामाजिक प्रभाव आकलन पर आधारित थी तथा परियोजना के कारण मछली की उपलब्धता में काफी कमी आई है जिससे हजारों मछुआरों की आजीविका खतरे में पड गयी है।

“एडीबी के बहरे कानों को मछुआरों की आजीविका बहाल करने की हमारी दलील सुननी पडेगी। है। जब एडीबी 50 वर्षों का जश्न मना रहा हैं, तब मुंद्रा में मछुआरे अपने जीवनयापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं,” “माछिमार अधिकार संघर्ष संगठन के महासचिव भरत पटेल कहते हैं। (विडीयो संदेश: https://youtu.be/3OePpbHqKIo)

इन 100 से अधिक कार्यक्रमों के माध्यम से, जनांदोलन और अन्य नागरिक समाज संगठन, एडीबी व अन्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों को ऋण के तरीको मे सुधार, उसमे पादर्शीता बरतने और जनता के प्रति जवाबदेह बनाने की मांग कर रहे हैं जिनके नाम पर वे अपना व्यवसाय चलाते हैं। इन संस्थानों द्वारा ऐसा न किये जाने पर जनता के पास, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इकठ्ठा होकर, रोकने वाले दमनकारी कानूनों के बावजूद अपना संघर्ष तेज़ करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं छोडा ।

कार्यक्रमो और स्थानो की विस्तृत जानकारी: https://wgonifis.net/places-of-action/
विडीयो संदेश एडीबी हेतु: https://wgonifis.net/videos/

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